तिरुपति बालाजी का मंदिर आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति के पास तिरुमला पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ पर भगवन श्री हरी विष्णु की वेंकेटेश्वर रूप में पूजा होती है। ये विश्व प्रशिद्ध मंदिर है।

तिरुपति बालाजी का दो कथाएं हमें मिलती है। (1) उनके वराह अवतार से  (2) माता लक्ष्मी और उनके वेंकेटेश्वर रूप से जुड़ी।

पहली कथा: आदि कल में पवन देव अग्नि को सांत करने के लिए अपना उग्र रूप धारण कर ब्रह्माण्ड में निकले जिससे बदल फट गयी और भरी वर्षा होने लगी।

भारी वर्षा के कारन पृथ्वी जलमग्न हो गयी धरती पाताल लोक चली गयी। तब भगवन विष्णु ने वराह अवतार लेकर अपनी तुस्क से पृथ्वी को बहार निकाले।

पुनः भगवान ब्रह्मा केयोगबल से पृथ्वी पर जीवन का संचार हुआ और लोग रहने लगे।

तब ब्रह्मा के विशेष आग्रह पर भगवन वराह ने एक रचना का रूप धारण किया और अपने चार हाथों वाली देवी लक्ष्मी के साथ कृदचला विमान पर निवास किया। लोगों को ज्ञान, कर्म, योग और वरदान देने का फैसला किया।

दूसरी कथ : आदि वराह कलयुग आने पर पर्वत छोड़कर अपने लोक चले गए। इससे ब्रह्मा जी चिंतित हो उठे।

उन्होंने नारद जी को कहा, नारद जी चले इसका निवारण ढूंढने, रक दिन नदी तट पर उन्होंने देखा की भृगु ऋषि तप कर रहे है। तब नारद ने कहा आपके तप का फल त्रिदेवों में किसे मिलेगा।

ऋषि इस बात को जानने के लिए सभी देवों के पास गया, तब विश्नि जी के पास जाने पर उन्होंने क्रोधित होकर उनके छाती पर लात मारी। विष्णु जी ने दंड देने के वजय उनके पैरों को सेवा की। ..

विष्णु जी के छाती पर लात मारने के वजह से माता लक्ष्मी अत्यंत क्रोधित हुयी और उन्होंने ऋषि को दण्डित करने की आग्रह की। ऐसा न करने के वजह से माता वैकुण्ठ छोर पृथ्वी पर चली गयी और तप करने लगी।