[PDF] Shiv Tandav Stotram | शिव ताण्डव स्तोत्र पीडीऍफ़ फाइल डाउनलोड

Shiv Tandav Stotram | Shiv tandav Story | Shiv Tandav Mantra | Shiv Tandav Mantra by Ravan

Shiv Tandav Stotram : नमस्कार आज हम आपको शिव तांडव स्त्रोत पाठ का पीडीएफ लिंक देगे | और साथ ही उसी से जुड़ी रोचक कहानी के बारे में भी बताएंगे शिव तांडव स्त्रोत भगवान शिव को खुश करने का एक मंत्र है | दोस्तों हम आप को बता दे की भगवान शिव को खुश करना आशान है | बाबा जी जल्दी अपने भगतो से जल्दी खुश हो जाते है इसी लिए शंकर जी को भोले बाबा कहते है |

Shiv Tandav Stotram : प्यारे भगतो आज की इस पोस्ट मे हम आप को शिव तांडव की एक मजेदार कहानी से रूबरू करवायेगे | हो सकता है ये कहानी आप ने पहले नहीं सुनी ही तो ध्यान से पढ़िएगा ये शिव और अपने घमंड में पागल रहने वाले दसानन रावन की | और आप को ये भी बतेयेगे शिव ताण्डव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotram) की रचना कहा से हुई | रावन भगवान शिव का बहुत पड़ा भगत था और एसे कहा जाता है की रावन से बड़ा कोई ज्ञानी पंडित नहीं था |

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Shiv Tandav Stotram

शिव ताण्डव स्तोत्र पीडीऍफ़ फाइल की जानकारी |Shiv Tandav Stotram file Details

Name of the PDF FileShiv Tandav Stotram | (शिव ताण्डव स्तोत्र)
PDF File Size4.7 MB
CategoriesReligious
SourcePDFHIND.COM
Uploaded on31-12-2021
PDF LanguageHINDI & SANSKRIT

शिव ताण्डव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotram) की रचना :-

यह उस समय की बात है जब रावन को अपने घमंड और लालच के आलावा कुछ दिख नहीं रहा था | तब उस ने अपने मोसेरे भाई भगवान कुबेर से जबरन हासिल कर वहां का राजा खुद को घोषित कर वहां की राजगद्दी पर बैठा | घमंडी रावन ने भगवान कुबेर जी से उनका पुष्पक विमान भी छीन लिया था | कुबेर जी के पुष्पक विमान की यह खासियेत थी की वह मन की गति के अनुसार चलता था |

एक बार रावन पुष्पक विमान में घुमने जा रहा था तब कैलाश पर्वत को देखा | रावन को वहां का द्रश्य बहुत ही अच्छा लगा तो उसने कैलाश पर्वत को लंका में ले जाने के लिए सोचा | रावन ने वेसा ही किया वह अपने बीस हाथो की मदद से कैलाश पर्वत को उठा चलने लगा तब भगवन शिव अपने ध्यान से मन विचलित हुवा और शिव जी को भयेकर गुस्सा आ गया |

शिव ने देखा तो उन्होंने अपने अंगूठे से कैलाश पर्वत को वही रोक दिया और रावन कैलाश के निचे दब गया | वह निचे दबे दबे भावब शिव से अपने प्राण बचने की गुहार करने लगा कहने लगा “शंकर-शंकर” जिस का अर्थ है की – क्षमा कीजिय , क्षमा कीजिय और फिर उस ने भोले बाबा को खुश करने के लिए संस्कृत में कुछ श्लोक का उचारण करने लगा | और भगवान शिव ने जब वह श्लोक सुने तब भोले बाबा बहुत ही प्रसन्न हुवे और रावन को वहां से मुक्त किया | रावन ने जो श्लोको का उच्चारण किया वो शिव ताण्डव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotram) कहे गए |

रावन न्र जिन मंत्रो का उच्चारण किया वे मंत्र पहले से ही सामवेद में लिखे गए थे | दोस्तों आप को पता ही ह की रावन आक बहुत ही बुद्धिशाली, प्राकर्मी, वेदों का ज्ञानी, राजनीतिग्य, और बहुत विद्वान पंडित था | उक को अमर रहने का वरदान प्राप्त भी था |

कैसे करे शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ | How to do Shiv Tandav Stotram

  • सुबह जल्दी उठ कर नित्य क्रिया कर के जल्दी स्नान करे |
  • फिर साफ कपडे पहन कर मंदिर में या अपने पूजा का स्थान पर पूजा सामग्री तैयार करे |
  • पूजा सामग्री में पान, धतूरा, सुपारी, ऋतूफल, रोली, मोली, धुप, कपूर, लोंग, कुमकुम, माला, लोटा, गंगाजल, दीपक, पंचाम्रत [गाये का दूध, घी, दही, शहद, शक्कर , आरती के लिए थाली, आम के पत्ते आदि |
  • पूजा सुरु करने से पहले पूजा स्थान पर पूर्व दिशा की और मुह करके विराजमान हो |
  • अआब शिवलिंग को दूध, जल, दही से स्नान करवाना चाहिय
  • पूजा सुरु करने से पहले अपने आप को शुद्ध करना चाहिये |
  • शुद्धिकरण के लिए निचे लिखे मंत्रों का उचारण करे |
    • ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा। रीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
  • शुद्धिकरण करने के बाद शिव ताण्डव स्तोत्र के पाठ को सुरु करना चाहिए | स्तोत्र का उचारण करते समय संगीत की तरह गाते हुवे मंत्रो का जाप करना चाहिय |

शिव ताण्डव स्तोत्र को पाठ करने फायेदे | Benefits of Shiva Tandav Stotram

शिव ताण्डव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) के मंत्रो का जप करने के 10 अनोखे फायेदे –

  • शिव ताण्डव को गा कर पाठ करने से शिव जल्दी प्रसन्न होते है |
  • शिव ताण्डव स्तोत्र (shiv tandav stotram) का पाठ निर्धन को भी लाभ मिलता है |
  • शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करने से सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है।
  • शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करने से शिव की कृपा से सिद्धि-बुद्धि, धन-बल और ज्ञान-विवेक की प्राप्ति होती है।
  • शिव ताण्डव स्त्रोत का पाठ करने से स्मरणशक्ति और अपने आप में आत्मविश्वास बढ़ता है |
  • शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से वो हर तरह के सुख का भागीदार बनता है।
  • शिव ताण्डव स्तोत्र के मंत्रो का जाप करने से हमरे शरिर में एक सकारात्मक उर्जा मिलती है | 
  • शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करने से माँ लक्ष्मी का भी आशीर्वाद हमेशा बना रहता है |
  • शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करने से बुरी किस्मत,स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित बच्चे, काला जादू, दुःस्वप्न और पिछले जन्म के कर्मो का पश्याताप करने का मोका मिलता है |
  • प्रतिदिन शिव ताण्डव स्तोत्र (shiv tandav stotram) का पाठ करने से वैवाहिक रिश्तों को भी लाभ मिलाता है |

शिव तांडव स्तोत्र मंत्र |Shiv Tandav Stotram Mantra

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकारचंडताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम् ||

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है, और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है, भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें ।

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि |
धगद् धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम: ||

मेरी शिव में गहरी रुचि है, जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है, जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं ? जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है, और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं ।

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधूवंधुर
स्फुरद्दगन्त संतति प्रमोद मानमानसे |
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ||

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे, अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं, जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं, जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है, और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं ।

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे |
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ||

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं, उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है, ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है|

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः |
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ||

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, जिनका मुकुट चंद्रमा है, जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं, जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है, जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है ।

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ |
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ||

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें, जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था, जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं, जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं ।

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके |
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ||

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं, जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया, उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद् की घ्वनि से जलती है, वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर, सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं ।

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः |
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ||

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं, जिनकी शोभा चंद्रमा है, जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है, जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है ।

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌ |
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ||

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है, पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ, जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है ।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया ।

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ |
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ||

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं । शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण, जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया ।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर द्धगद्धगद्वि
निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ||

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है, जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण, गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई ।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ||

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता, जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि, घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति, सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ||

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए, अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए, अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए, महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः |
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ||

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है, वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है । इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है । बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है ।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना |
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ||

सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाये हुए इस शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं ।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌ |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ||

प्रात: शिवपूजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़े आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ||

प्रात: शिवपूजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़े आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।

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